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बात उन दिनों की है जब मैं कॉलेज में नया-नया भर्ती हुआ था। शहर में पहली बार अकेले रहने के लिए मैंने एक टुटपुंजिया सा कमरा किराए पर लिया था, जहाँ मैं अपने खुराफाती दिमाग के साथ दिन काट रहा था। मेरे कमरे के ठीक बगल में कमलेश अंकल का परिवार रहता था। उनके घर में उनकी लड़की संजू थी, साली एकदम माल थी, मानो चोदने के लिए ही पैदा हुई हो। उम्र होगी कोई 20-21 साल की। गोरा-चिट्टा रंग, गदराया हुआ जिस्म, चूचियाँ ऐसी कि साड़ी फाड़कर बाहर निकलने को बेताब, और गाँड इतनी भारी कि चलते वक्त लचक-लचक कर लंड में आग लगा दे। उसकी आँखों में शरारत और होंठों पर वो देसी ठसक भरी मुस्कान थी, जो किसी भी मर्द का लंड पल में खड़ा कर दे।
संजू मुझे चोरी-छिपे ताड़ती रहती थी। उसकी नजरें जैसे मेरे जिस्म को चाट रही हों। मुझे लगता था कि साली बात करना चाहती है, पर देसी लड़की के नखरे तो देखो, बस आँखों से ही आग लगाती थी। मैंने कई दिनों तक उसका पीछा किया, मतलब नजर रखी। जब भी बाहर निकलता, वो कहीं न कहीं दिख ही जाती। कभी आँगन में कपड़े सुखाती, कभी गली में पानी भरती। नजरें मिलतीं, तो मैं हल्का सा मुस्कुरा देता। वो भी साली, आँखें झुकाकर, होंठ दबाकर एक कातिल हंसी दे देती। हम दोनों के बीच एक देसी वाला तनाव पनप रहा था, जैसे दोनों चाहते थे कि कुछ गर्मागर्म हो, पर कोई पहल नहीं कर रहा था। मैं कमलेश अंकल के परिवार से गली-मोहल्ले में मिलता-जुलता था। कभी बाहर चाय की टपरी पर, कभी उनके घर के बाहर गपशप हो जाती, पर उनके घर अंदर जाने की हिम्मत नहीं हुई थी। फिर भी, संजू की हर अदा मेरे दिमाग में घूमती थी, और रात को लंड पकड़कर बस उसी के ख्यालों में खो जाता था।
एक दिन मैंने ठान लिया कि अब और नहीं, आज तो संजू को करीब से ताड़ना है। उनके घर चला गया, बहाना बनाया कि अखबार पढ़ना है। सोफे पर बैठा अखबार पलट रहा था, पर आँखें तो संजू को ढूंढ रही थीं। वो आई, मेरे पास खड़ी हो गई और मेरे बारे में पूछने लगी—कॉलेज कैसा है, गाँव में क्या करता था, और न जाने क्या-क्या। उसकी आवाज में एक चिकनी सी मिठास थी, जैसे शहद में डूबा लड्डू। वो बात करते-करते मेरे करीब आ गई, और उसकी साड़ी का पल्लू हल्का सा सरक गया। मैंने देखा, उसकी चूचियाँ ब्लाउज में कैद थीं, पर जैसे बाहर निकलने को तड़प रही हों। तभी उसकी माँ, सीमा आंटी, आ गईं और वो भी मेरे बारे में सवाल करने लगीं। उस दिन से मेरी उनके परिवार से पक्की जान-पहचान हो गई।
अब मैं हर दूसरे दिन उनके घर जाने लगा। कमलेश अंकल और सीमा आंटी मुझे बुला लेते थे, और महीने भर में ही मैं उनके घर का हिस्सा बन गया। संजू से मेरी बातचीत अब खुलकर होने लगी थी। वो मुझसे देसी स्टाइल में ठिठोली करती, मेरे मजाक पर हँसती, और कभी-कभी मेरी तारीफ सुनकर शरमा जाती। उसकी शरम में भी एक शरारत थी, जैसे वो जानबूझकर मुझे उकसा रही हो। हम दिन में मिलते, और रात को टीवी देखने के बहाने घंटों गप्पे मारते। कई बार मैं देर रात तक उनके घर रुक जाता। आठ महीने तक यही सिलसिला चलता रहा। संजू और मेरे बीच की दोस्ती अब कुछ और ही रंग ले रही थी। उसकी हर नजर, हर हंसी, मेरे लंड में आग लगा रही थी। मैं रात को बिस्तर पर लेटकर बस उसके जिस्म के ख्यालों में डूब जाता, और लंड बार-बार सलामी देने लगता।
एक दिन कॉलेज से लौटा तो पता चला कि कमलेश अंकल के परिवार में किसी की मौत हो गई थी। अंकल, आंटी, और बाकी लोग गाँव चले गए थे। घर में सिर्फ संजू और उसकी छोटी बहन रिया थी, जो सात साल की थी। संजू ने मुझे बताया कि मम्मी-पापा को अचानक जाना पड़ा है, और वो शायद शाम तक या अगले दिन तक लौटेंगे। उन्होंने कहा कि मैं रात को उनके घर रुक जाऊँ, ताकि संजू और रिया अकेले न रहें। मैंने तुरंत हाँ कर दी। मन में तो जैसे मेला लग गया। संजू के साथ अकेले वक्त बिताने का मौका, वो भी रात भर—ये तो लंड के लिए जन्नत थी।
शाम को मैं अपने कमरे में खाना बना रहा था कि बाहर दरवाजे पर ठक-ठक हुई। दरवाजा खोला तो संजू खड़ी थी। बोली, “टिंकू भैया, यहाँ खाना मत बनाओ। मैंने घर पर सब बना लिया है। चलो, साथ में खाएँगे।” मैंने बर्तन पटके और उसके साथ अंकल के घर चला गया। वहाँ जाकर मैंने टीवी चालू किया और सोफे पर टांगें पसारकर बैठ गया। थोड़ी देर में रिया आई और बोली कि उसे नींद आ रही है। मैंने कहा, “यहाँ मेरे पास लेट जा, छोटी रानी।” वो मेरे बगल में लेट गई और पाँच मिनट में खर्राटे मारने लगी। संजू खाना बनाने के बाद नहाने चली गई।
जब वो नहाकर लौटी, तो मैं तो बस उसे देखता ही रह गया। साली, क्या माल लग रही थी! गीले बाल, जो उसकी पीठ पर लटक रहे थे। पतली सी सलवार-कमीज, जो उसके गीले जिस्म से चिपकी थी, जैसे उसका हर कटाव मेरे सा